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Have you ever been refused to file an FIR by the police?

Reasons:-

The refusal of writing FIR is a very frequent practice with the intention to show less crime record in the jurisdiction and to minimize the workload of a particular police station.

Generally, police try to settle the matter without logging the FIR which creates the win-win situations for both the parties’ i.e. complainant and defendant. But in many cases police tries to escape from its duty to lodge FIR to eliminate the burden of work. Current practice leads to an environment where a victim suffers at the end of police and victim struggles for justice.

Excuses: Less Valuable Products –The products which are less in value are not considered by police officials as an issue enough to lodge an FIR (it is right of every citizen and obligation of the police authority to lodge an FIR for any type of loss).

Remedies:-

Any person aggrieved by the refusal of police in charge to lodge the FIR, one may send the substance of such information, in writing by a post to the superintendent of Police under section 154(3) CrPC. Even if SP declines to take action, a victim can go to DIG then IGP and then lastly to DGP. Besides this while making a complaint, remember to take the receiving of the complaint in form of seal and signature of concern officer on the copy of such complaint.

Zero FIR can be filed in any police station irrespective of place of incident or jurisdiction and the same can be later transferred to the appropriate Police Station. If any Police authority declines from writing an FIR, one can also directly approach the magistrate in written for lodging his complaint; under section 156(3) magistrates will empower an order to police to investigate on such complaint. It is the duty of an officer to write the FIR in exact words and to read it to the complainant and give the copy of FIR for free of cost as mentioned under section 154 of CrPC.

Recommendations:- Always file a written complaint in such cases and take a duly sealed & signed acknowledgment from the police authority. This may further be used as an FIR or to file a private complaint in the court.

BABU-MOSHAI of the system

Clerks (aka babuji), Drivers and Peons in a Government departments are more powerful than the Officer himself!
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How often are we denied our demands on the gate itself; all those shields to the Officers are so strong that one won’t even dare to argue with them! After all, these are the pillars of Indian bureaucratic system, who can make or mar the future of any file…

They are the people with the utmost knowledge of associated Laws and more often or not, have a better understanding of the systems & procedures than the Governing officer himself! These are the people with a lot of experience, and even guide the officer in charge as they have been doing this job since ages! The knowledge should be respected, but the abuse of this knowledge is unacceptable…

These Babu- moshai escape almost every time as the burden of any wrongdoing is to be shouldered by the Officer in charge, but actually the culprit is someone else…
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Elimination of Baburaj was one of the main agenda after we got independent; but alas, it has followed the suit of unending agendas like Reservation!

At least, make them accountable for any wrongdoing and that accountability should be really tough!

जात न पूछो उपद्रवी की

उसने कहा, मैं नाराज हूं। मैंने कहा, तुम्हे इस बात का हक है। उसने कहा, मेरे साथ पीढिय़ों से अन्याय हुआ है। मैंने माना, मैं इसके लिए शर्मिंदा हूं। उसने फिर कहा, अन्याय का प्रतिकार किया जाना चाहिए। मैंने स्वीकार किया। उसने दोहराया, उन्हें इसका मूल्य चुकाना ही होगा।

अब सवाल करने की बारी मेरी थी। मैंने पूछा, जिन लोगों ने यह सब किया वे कहां हैं। उसने मध्यम स्वर में जवाब दिया, वे तो अब नहीं हैं। मैंने पूछा, उनका साथ देने वाले लोग। वह बोला वे भी चले गए। मैंने कहा, कोई तो होगा ही उनमें। उसने धीमे से जवाब दिया.. नहीं अब कोई नहीं है। मैंने फिर पूछा तब फिर बदला किससे लोगे। वह बोला, लोग चले गए, लेकिन सोच नहीं बदली है। अब भी हमारे लिए चाय का कप अलग है। सामने जूते पहनने की इजाजत नहीं है। बरात नहीं निकाल सकते। मंदिर में नहीं जा सकते।

मैंने पूछा क्या सब ऐसा कर रहे हैं, उसने आंख नीचे कर कहा, नहीं कुछ लोग हैं। मैंने फिर सवाल किया तो क्या कुछ की सजा सबको दिया जाना लाजमी होगा। वह कुछ नहीं बोला। मैंने दोहराया, तुम्हारे किए की सजा क्या तुम्हारे बेटे को दी जा सकती है। तुम जिस क्लास में फेल हुए, क्या उसमें तुम्हारे बेटे को भी पास होने का हक नहीं होगा। वह कुछ नहीं बोल पाया। मैंने फिर पूछा, क्या मानसिकता सिर्फ उनकी ही नहीं बदली है या बाकी लोग भी इसमें शामिल है। वह कुछ नहीं बोल पाया।

फिर अचानक से उसे कुछ खयाल आया। झुंझलाते हुए बोला। इन बातों से काम नहीं चलेगा। हमारे साथ अन्याय हुआ है और अन्याय का बदला हम लेकर रहेंगे। यही कहा गया है, यही बताया जा रहा है और यही हो रहा है। अभी कुछ दिन पहले होटल में भी मार दिया था। क्या हम होटल में बराबर बैठकर खा नहीं सकते। हम भी इंसान हैं, इंसान का दर्जा नहीं देंगे तो कैसे चलेगा। मैंने पूछा, वह एक जघन्य अपराध था भाई। उसके लिए कानून सजा देगा। यहां भी तो 17 लोग मार दिए गए हैं। क्या इसकी सजा नहीं मिलना चाहिए।

वह बोला, आखिर कब तक अन्याय सहेंगे हम। मैंने कहा, तुम क्या चाहते हो। वह तपाक से बोला, हमें इंसाफ चाहिए। पूूछा, इंसाफ माने क्या। क्या किया जाए जिससे तुम्हे लगे कि पीढिय़ों के अत्याचार का बदला चुका दिया गया है। वह कुछ नहीं बोल पाया सोच में पड़ गया। मैंने कहा, यही चाहते हो ना कि बच्चों की पढ़ाई का अच्छा इंतजाम हो, उन्हें अपने आपको विकसित करने के पूरे मौके मिले। नौकरी में प्राथमिकता दी जाए। वे खुद को किसी तरह हीन न समझें। इसके लिए हर संभव प्रयास हो।

उसने कहा, हां यही, यही होना चाहिए। मैंने पूछा, पर यह सब तो हो ही रहा है। फिर आक्रोश किस बात का। ये नाराजगी क्यों। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, कहने लगा लेकिन जो अन्याय हुआ है, उसका क्या होगा। मैंने कहा अगर अन्याय का बदला अन्याय ही है तो फिर यह तो कभी खत्म ही नहीं होगा। एक अंतहीन सिलसिला चलता रहेगा। एक गोला घूमता रहेगा।

मेरी पीढ़ी ने तुम्हारी पीढ़ी के साथ। तुम्हारी पीढ़ी ने मेरी पीढ़ी के साथ। फिर यह उल्टे-सीधे, सीधे-उल्टे क्रम में चलता रहेगा। क्या चाहते हो, देश को तमाम मसले छोडक़र इन्हीं पर लड़ते देखना चाहते हो क्या। वह कुछ नहीं बोल पाया। फिर उसे कहीं से एक झंडा याद आया। कहने लगा, नहीं ये झंडा सबसे ऊपर होना चाहिए। तभी देश बदलेगा, जब ताकत हमारे हाथ होगी, तब ही तो निजाम बदलेगा। मैं समझ चुका था कि वह सब समझता है, लेकिन चंद लोगों की सियासी भूख ने जिन्हें मोहरा बना लिया है, उन्हें समझाना इतना आसान भी कहां हैं।

इतना जरूर है कि हर बात का फैसला अगर सडक़ पर होने लगा तो देश को जंग का मैदान बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। देश व्यवस्थाओं के अनुशासन से चलता है। कोई भीड़ या भेड़तंत्र कभी इसका सूत्रधार नहीं हो सकता। लाठियों से भैंस हांकी जा सकती है, तंत्र को हांकने की गलती मत कीजिए। यह लोकतंत्र है, अगर तर्क में दम है और विचारों में आग है तो आइये बहस कीजिए।

मुद्दे उठाइये, अदालतों के दरवाजे खुले हैं, वहां जाइये। न्याय की गुहार लगाइये। यदि फिर भी हल न मिले तो संसद की राह भी खुली है। निजाम बदलने की जुर्रत दिखाइये। सडक़ों पर बेगुनाह लोगों की जान लेकर कुछ हासिल नहीं होने वाला है। लाठियां बोएंगे तो लाठियां ही उगेंगी और आप के हिस्से में भी आज नहीं तो कल वे ही आएंगी।

 

Courtesy Amit ji (Editor of Patrika)

ये रोशनी और ये पटाखों का शोर

1-2 अक्टूर 1998 की रात है। जोधपुर के पास कांकणी गांव के लोग शोर सुनकर अचानक जाग जाते हैं। दौडक़र घरों से बाहर आते हैं। एक जिप्सी जाती हुई नजर आती है। उसमें फिल्म स्टारों की टोली है। जमीन पर दो हिरण के शव पड़े दिखाई देते हैं। एक हिरण की रीढ़ की हड्डी में गोल निशान है। इसके बाद 20 साल लगते हैं, यह साबित करने में कि हिरण का शिकार किया गया है। बाकी लोग बरी हो जाते हैं, सिर्फ एक दोषी साबित होता है। वह भी दो रात और दिन के एक टुकड़े के लिए जेल जाता है, फिर जमानत पर बाहर आ जाता है। आप हिसाब लगाते रहिये कि सक्षम अदालत का फैसला कितने घंटों तक प्रभावी रहा।

क्योंकि यह हिसाब से सुलझने वाला मसला ही नहीं है। बस इस केस के 20 वर्षीय सफर पर गौर कीजिए। कैसी-कैसी दलीलें दी गई हैं। मामले में दोषी साबित अभिनेता सलमान खान ने तो एक टीवी इंटरव्यू में यह तक कहा कि मैंने तो हिरण की जान बचाई है। मैं वहां पहुंचा तो वह घायल था। मैंने उसे पानी पिलाया, बिस्किट खाने को दिए। उसने कुछ बिस्किट खाए और वह वहां से चला गया। गोया वह यह बताने की कोशिश कर रहा हो कि कैसे अहसानफरामोश लोग हैं, वे एक फरिश्ते को ही शिकारी समझकर कोर्ट-कचहरी में घसीट रहे हैं।

उनके वकील ने भी अदालत में कुछ ऐसा ही तर्क दिया कि हिरण की रीढ़ पर जो गोल निशान है, वह गोली का ही हो यह जरूरी नहीं है। ऐसा निशान जलते हुए कोयल से भी हो सकता है। यानी किसी ने सुलगता हुआ अंगारा हिरण की पीठ पर रखा होगा और तब तक दबाया होगा जब कि उसकी हड्डी में सुराख न बन गया हो। फिर बेहद आला दर्जे की यह दलील भी पेश की गई कि जांच एजेंसी ने हिरण की स्किन रिसर्च के लिए नहीं भेजी गई। सिर्फ रीढ़ की हड्डी भेजी गई, जबकि स्किन से अहम सुराग मिल सकता था। फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रीढ़ के उस छेद को गोली का घाव बताया गया है।

हद तब हुई जब वकील ने यह तक कह दिया कि हिरण तो ज्यादा खाने से मरे हैं। ये भी हो सकता है उन्हें क्षेत्र के कुत्तों ने ही मार दिया हो। जब इलाके में ही इतने खूंखार कुत्ते हैं तो फिर बाहर के किसी व्यक्ति के लिए इसकी क्या गुंजाइश निकल सकती है। वकील साहेबान ने यह तर्क भी दिया कि नई सोच के तहत बेल इज द रूल एंड जेल इज एक्सेप्शन यानी जेल तो सिर्फ दुर्लभ मामलों के लिए बचा के रखिये, बाकी के लिए तो जमानत ही नियम है। ये और बात है कि ज्यादातर मामलों में जमानत को जज का विवेकाधिकार माना गया है। अब विवेक और अधिकार दोनों किसी के खूंटे से बंधी भैंस तो नहीं है कि जब चाहे हकाला जाए और जब चाहे उसके दूध से भगोना भर लिया जाए।

आप तो तालियां बजाइये कि क्या गजब व्यवस्था है। हम ही तो कहते आ रहे हैं कि चाहे 10 गुनहगार बच जाएं, लेकिन एक भी बेकसूर को सजा नहीं होना चाहिए। हमने 10 गुनहगारों में से एक बेकसूर को बचाने में ही पूरी ताकत झोंक रखी है। और उसे बेकसूर बनाने के लिए कितनी जद्दोजहद की गई है, इस पर भी गौर कीजिएगा। वे मददगार हैं, सहृदय हैं, ये सारी कहानियां बाद ही में तो छनकर बाहर आई हैं। इसके पहले तो इसे धमकाया, उसे पीटा, उसके साथ गाली-गलौज की, टाइप के ही केसेस सामने आते थे। आप इसे कानून के डर से व्यक्तित्व निर्माण की अनूठी मिसाल भी कह सकते हैं।

इसलिए कभी-कभी समझना मुश्किल हो जाता है कि कानून हमें चला रहा है या हम कानून को चला रहे हैं। कभी-कभी कानून हार्ट पेशेंट के ईसीजी की तरह लगता है। कब-कितना ऊपर जाएगा और कब कितना नीचे जा सकता है, अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। सवाल पूछने की इजाजत नहीं है वरना पूछ सकते थे कि आखिर ऐसा कैसे हो जाता है कि जो केस 15 नंबर पर सूचीबद्ध हुआ था, वह अचानक 1 नंबर पर आ गया। जमानत बख्शने वाले जज को सजा देने वाले जज से मंत्रणा की आवश्यकता क्यों आन पड़ी।

इन सबके बाद भी ये रोशनी और ये पटाखों का शोर सुनकर दिल में हुक सी उठती है। मन करता है कि काश एक छोटा सा दीपक कोई उस विश्नोई समाज के लिए भी जलाए, जिसके अथक और अहर्निश संघर्ष की बदलौत ही इन्हें 20 दिन जेल में बिताने पड़े हैं। हम इसी से संतोष कर सकते हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि तमाम गवाहों के बयानात और सबूतों की चकाचौंध रोशनी के बावजूद देश में कानून सांस ले रहा है।

सवाल पूछने की आदत से बाज न आए तो आखिर में इतना जरूर पूछ लीजिएगा कि क्यों किसी अदालत का कोई फैसला दो रात और दिन के एक टुकड़े के बाद ही नए अर्थ ग्रहण कर लेता है।

 

Courtesy @ अमित मंडलोई

पीपल की मुट्ठी में कैद मुस्कुराहटें

घर से कुछ दूर तिराहे पर अचानक एक ओर निगाह उठी तो कुछ क्षण के लिए ठिठक गया। खाली पड़े प्लॉट के कोने पर एक पीपल जैसे तालियां बजाकर खिलखिला रहा था। उसके ठहाकों में ऐसा जादू था कि मुझे गाड़ी किनारे लगाकर रुकना ही पड़ा। कुछ क्षण उसे देखता ही रह गया। दोपहर की शुरुआत में माथे से पसीने की धार निकलने लगी थी और ये जनाब उन गर्म हवाओं में भी झूमकर नाच रहे थे।

पूरे बदन को धानी रंग की मखमली पत्तियों से ढंक रखा था। पत्तियां क्या शरारतों से भरी बच्चियां ज्यादा लग रही थीं। जिन्हें हर घड़ी बस उछलकूद के लिए बहानों का इंतजार हो। हवा का जरा सा झोंका आया नहीं कि ये उछल पड़तीं और देर तक उधम मचाती रहतीं। आसपास के पेड़ जरा से में हांफ कर थक जाते, थम जाते, लेकिन इनकी ऊर्जा में जरा कमी नहीं आती।

वैसे भी पास के पेड़ों पर मौसमी बुढ़ापा छाया है। अधिकतर पत्तियां सूख चुकी हैं और गिरने पर आमादा हैं, लेकिन पीपल पर तो बचपना तारी है। मानो सबको उलाहने दे रहे हों कि अगर वक्त से पहले बदलाव के लिए खुद को तैयार नहीं करोगे तो यही हाल होने हैं। गर्मी हर बार ऐसे ही आती है, तुम हर बार ऐसे ही उससे मिलते हो। कभी मेरी तरह मिलकर देखो गर्मी भी अपना अंदाज बदलने को मजबूर हो जाएगी।

मुझसे रहा न गया, मैं उसकी छांह में जाकर खड़ा हो गया। ऐसा लगा जैसे उसने सिर पर हाथ रख दिया हो। बड़ी ठंडक थी, उस छांह में, अलबत्ता उसने रोशनी पर अपना हक नहीं जताया था। नुकीली-पैनी पत्तियां भाले लेकर सूरज की किरणों को घेरकर खड़ी नहीं हो गईं। उनके साथ एक लय में आ गईं, जिससे पत्तियों का रंग और चटक कर ताम्बाई हो उठा, खिल गया, दमकने लगा। पत्तों से छनकर सूरज की किरणें वैसे ही मुझ तक पहुंच रही थी, लेकिन उनका तीखापन पत्तियों की कोमलता की संगत में मृदु हो गया। मैं जितनी देर उसकी छांह में खड़ा रहा, वह प्रेम से मेरे बाल सहलाता रहा।

आधी रात के बाद लौटते समय वह वैसे ही मुस्करा रहा था। पत्तियां दिनभर धमाचौकड़ी मचाकर थोड़ी थकी जरूर नजर आई, लेकिन जैसे छोटे बच्चे पूरी रात बिस्तर पर लोट लगाते हैं, वे भी हवा के झोंकों के साथ वैसे ही लटपट हो रही थीं। चारों तरफ एकदम शांति थी, लेकिन पीपल के आगोश में जैसे कोई संगीत निकल रहा था, स्नेह की बांसुरी बज रही थी। तभी मुझे महाभारत का प्रसंग याद आया, जिसमें कृष्ण ने कहा कि सभी वृक्षों में मैं पीपल हूं। इतनी चंचल पत्तियों के नीचे गौतम की मौजूदगी का अहसास हुआ, जो इसी छांह में बुद्धत्व को प्राप्त हुए।

मैं सोच में पड़ गया कि ये कैसा विरोधाभास है। जो पेड़ एक क्षण रुकने को तैयार नहीं है, थमना-ठहरना, जिसने कभी सीखा ही नहीं, उसी की छांह के नीचे कैसे ध्यान का अलख जगता है। सारी गतियां विराम को पा जाती हैं। कोई मन की चंचलता से पूर्ण रूप से मुक्ति पा जाता है, वैराग्य के शीर्ष को छू लेता है, आत्म दीप प्रदीप्त हो जाता है, बुद्ध हो जाता है।

नीचे कुछ पुराने मिट्टी के दीपक रखे थे, पूजन के लिए लपेटे गए सौभाग्य के सूत के अंश भी नजर आ रहे थे। मैं पूछना चाहता था, देव वृक्ष ये मन्नतों का बोझ तुम्हारी चंचलता को कम तो नहीं कर रहा। क्या है ऐसा, जो तुम सबकी फिक्र ओढक़र भी अपने आनंद में मग्न में हो। कहीं इसी गुण ने तो तुम्हे सभी का प्रिय नहीं बना रखा है। वह कुछ नहीं बोला, बस हंसा और मेरी तरफ कुछ पुरवाई छोड़ दी। उनका स्पर्श संगीत की तरह अब भी मेरे रोम-रोम में प्रकम्पित है।

 

पीपल सारी गतियों की दिशा परिवर्तन का ही नाम है। मौसम की धूप-छांह से विरत हो अपने ही आनंद में डूबे रहने का नाम है। अब जब भी उसके पास से गुजरता हूं वह मुट्ठियों में भरकर मुझ पर मुस्कुराहटें फेंकता है।
Courtey # अमितमण्डलोई

ईश्वर से प्रेम का मतलब पुजारी से प्रेम नहीं है

उन्होंने कहा स्त्री को छोड़ दो, मैंने पूछा क्यों, जवाब मिला मोह है। सद्मार्ग की राह का रोड़ा है। फिर कहा, धन-संपत्ति का त्याग कर दो, पूछा तो जवाब मिला माया है, मोहिनी है। पथभ्रष्ट कर देती है। मैंने कहा, ठीक है, मैं सब छोड़ दूंगा, बदले में क्या मिलेगा। जवाब आया, स्वर्ग मिलेगा। वहां क्या होगा तो सुनने को मिला, वहां सोने के पहाड़ हैं, पेड़ों पर हीरे-पन्ने लगते हैं। अपूर्व सुंदरी रंभा, उवर्शी और मेनका है। मैं समझ नहीं पाया कि अपनी स्त्री और पसीने की कमाई को छोडक़र स्वर्ग की मरीचिका में क्यों कूद पडूं। जवाब, उन्होंने ही दिया, जब मैंने पूछा कि अच्छा ये सब छोडक़र सौंपूं किसे तो कहने लगे, मुझे और किसे।

यह कहानी, थोड़े-बहुत बदलावों के साथ लगभग हम सभी ने सुनी है और कई ने इसे करीब से महसूस भी किया होगा। यही हो रहा है ना लंबे समय से हमारे साथ। कभी ईश्वर के प्रति प्रेम और आस्था जताकर तो कभी अनिष्ट का भय दिखाकर। हमें मोह और माया में डालने वाली चीजें छोडऩे को प्रेरित किया जा रहा है। हमारे उसी त्याग से बड़े-बड़े आश्रम बनाए जा रहे हैं। महंगी विदेशी गाडिय़ां खरीदी जा रही हैं। कीमती गहने और पोषाक तैयार की जा रही हैं। दुनिया को वैराग्य की राह दिखाने वालों में से अधिकतर खुद स्वर्गिक ऐशो-आराम में डूबे हैं। उन्हें न मोह सताता है और न ही माया से परहेज है। जिसे हमारे पैरों की बेड़ी कहते हैं, उसे ही उन्होंने कंठाहार बना रखा है।

तौर-तरीके देखे हैं ना। कितना बड़ा पंडाल लगेगा, उसमें कितने लोग कम से कम होंगे। भजन पार्टी कहां से आएगी। कितने लोगों का और कैसा भोजन बनेगा, ये सब बाबाजी तय करेंगे। टेंट हाउस तो खुद बाबाजी का है ही, चढ़ावे में भी उनका हिस्सा होगा। उसका प्रसारण किस चैनल पर होगा, इसका इंतजाम भी करना होगा। बाबाजी की दक्षिणा तय है, मंडली का इंतजाम भी पूर्व निर्धारित है। बाहर की दुकानों में बाबाजी की पुस्तकें बिकेंगी, पूजा सामग्री, फोटो, सिंदूर, मालाओं के साथ आयुर्वेदिक चूर्ण भी चटाए जाएंगे। आखिर में लोगों से गोदान कराई जाएगी, गुरुकुल में बटुकों के अध्ययन के लिए सहयोग मांगा जाएगा, तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशाला में सुविधाओं के लिए कमरे बनवाए जाएंगे, उनमें आपके नामकी पट्टिकाएं लगाई जाएंगी। इस दावे के साथ कि ये सारी पट्टिकाएं स्वर्ग में आपके महल की एक-एक ईंट बनेगी और वह भी खालिस सोने की।

हंसी आती है, लेकिन यह सब सच है। और इसकी वजह एक ही है हमने ईश्वर से प्रेम का मतलब पुजारी का प्रेम समझ लिया है। हम ईश्वर को प्रसन्न करने के बजाय पंडे-पुजारियों को प्रसन्न करने में लगे हुए हैं। न जाने कैसे ये धारणा हमारे भीतर गहरे तक पैठ गई है कि ये पंडे-पुजारी और कथा वाचक ईश्वर के करीब हैं और ये ही हमें उन तक पहुंचा सकते हैं। न भी पहुंचाएं तो कम से कम हमारे अच्छे-बुरे का हिसाब सुलझाने-सलटाने में मदद तो कर ही सकते हैं। हम भूल गए कि ईश्वर का दूत कभी भी प्राफिट एंड लॉस अकाउंट हाथ में लेकर नहीं आएगा। नफे-नुकसान की भाषा उसकी भाषा हो ही नहीं सकती।

वह आएगा भी तो शरीर पर भस्म रमाए, लंगोट पहने, मलंगों के वेश में निकलेगा। हाथ में कमंडल होगा तो ठीक वरना अपने हाथ को ही पात्र बना लेगा। न छत की परवाह करेगा और न फर्श की चिंता में डूबा होगा। गृहस्थ भी होगा तो विरक्त होगा। जो किचिंत भी मठ-मंदिर-मस्जिद और आश्रम में उलझा है वह खुद क्या ईश्वर के करीब होगा और क्या हमें उस तक पहुंचाएगा। क्यों विवेकानंद भटकते थे एक ही सवाल लेकर, क्या आपने ईश्वर को देखा है। क्यों तमाम ज्ञानी-ध्यानी और प्रकांड विद्वान सकपका जाते थे यह सवाल सुनते ही। और आखिर में जिसने जवाब दिया नरेंद्र फिर कुछ और पूछ ही नहीं पाए, आखिरी सांस तक उसी के होकर रह गए।

दरअसल समस्या की जड़ यही है कि न जाने क्यों हम सब सामना करने के बजाय हमेशा माध्यम की तलाश में रहते हैं। चाहे फिर वह चुनौती हो या अवसर। हम चाहते हैं कि सीधे रास्ते के बजाय सबकुछ शॉर्टकट से मिल जाए। हमें मालूम है ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता क्या है, लेकिन हम उस पर चलने के बजाय चरणामृत पीकर, प्रसाद का पेड़ा खाकर ही उसे हासिल करने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। कहीं सवा रुपया चढ़ाकर स्वर्ग की सीढ़ी चढऩे का ख्वाब पाल लेते हैं, कहीं गाय को कुछ खिलाकर तसल्ली कर लेते हैं।

क्योंकि हौसला नहीं है, आत्मविश्वास नहीं है। इसलिए पंडित, पुजारी और मौलवियों के चक्कर काटते हैं। गाड़ी के बे्रक भले फेल हों, लेकिन उस पर नीबू-मिर्च टांगना नहीं भूलते। हमने अपनी जिंदगियां भी ऐसे ही नीबूू-मिर्च के हवाले कर रखी है, जानते हैं फिर भी समझना नहीं चाहते।

 

याद है ना वह जुमला जो हर प्रवचन के बीच-बीच में दोहराया जाता था। जय राम जी की बोलना पड़ेगा। लोग जोश में भरकर तुरंत जय राम जी की बोल देते थे। हम भी सोचते थे कि चलो किसी बहाने ही सही अगर लोग राम का नाम ले रहे हैं तो क्या बुरा है। किसे पता था कि लोगों से अलग-अलग अंदाज में राम का नाम लेने के लिए प्रेरित करने वाला खुद राम के सवर्था विपरीत आचरण को जी रहा है। आज अंजाम तक पहुंचे हैं, शायद इसके बाद ही सही लोगों को समझ आए कि हमारा ईश्वर और धर्म किसी आसाराम का मोहताज नहीं है। अगर है तो हमें उसके बारे में फिर से सोचना होगा।
Courtesy #अमितमण्डलोई

कुंवारों ने ऐसी क्या खता की

समझना मुश्किल है कि आखिर देश के कुंवारों से ऐसी क्या खता हुई है कि लोग उन्हें छोडऩे का नाम नहीं लेते। गली-मोहल्लों से लेकर ग्लैमर और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की उम्र जरा बढ़ी नहीं कि लोग बातें बनाने लगते हैं। नाक में खुजली होने लगती है कि कहीं चक्कर तो नहीं चल रहा। गोया लोग ये हजम ही नहीं कर पाते कि कोई सामान्य पुरुष स्त्री के प्रति आकर्षित हुए या उसके चक्कर में पड़े बगैर जीवित रह सकता है। जिस देश में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक कुंवारे रह चुके, वहां किसी का कुंवारापन न जाने क्यों सभी की आंख में खटक रहा है।

एमए अंग्रेजी की पढ़ाई के दौरान चाल्र्स का बेचलर्स कम्प्लेंट पर एक निबंध पढ़ा था, जिसमें वे एक कुंवारे व्यक्ति की व्यथा बयां करते हैं। बताते हैं कि शादीशुदा लोग कुंवारों का जरा ध्यान नहीं रखते हैं। सार्वजनिक स्थलों पर भी प्रेम प्रकट करने लगते हैं। उन्हें जरा खयाल नहीं आता कि आसपास कोई कुंवारा व्यक्ति भी हो सकता है, उसके दिल पर ये सब देखकर क्या गुजरती होगी, लेकिन अपने यहां तो किस्सा ही उलटा है।

जब वी मेट में ट्रेन छूट जाने पर हीरोइन स्टेशन मास्टर के कैबिन में पहुंचती है तो बूढ़ा रेल अधिकारी उसे मुफ्त की सलाह देता है। कहता है, अकेली लडक़ी खुली तिजोरी की तरह होती है। लडक़ी के प्रति इस सोच के पारंपरिक कारण तो फिर भी समझ आते हैं। सदियों से कुंठित पुरुष मानसिकता इससे अधिक आम बात क्या सोच सकती है, लेकिन वैसे ही बेसब्री किसी पुरुष के प्रति थोड़ा असहज करती है। हो सकता है, जैसे उन लोगों को अकेली लडक़ी खुली तिजारी लगती है, वैसे ही अकेला लडक़ा छुट्टा सांड नजर आता हो।

ये भी संभव है कि उन्हें डर हो कि कहीं इसके कारण उनके घर की कोई स्त्री खतरे में न पड़ जाए। इसलिए बेहतर है कि कहीं से भी कोई खूंटा ढूंढ कर गाड़ा जाए और उससे इस अकेले पुरुष को भी बांध दिया जाए। इसलिए जरा उम्र बढ़ी नहीं कि साथ के लोग ही ताने मारने लगते हैं। उलाहने देते हैं, अड़ोसी-पड़ोसी से लेकर नाते-रिश्तेदार भी खिंचाई पर उतर आते हैं। भई अब तो बाल भी सफेद होने लगे हैं, किस का इंतजार कर रहे हो। ऐसी कौन सी परी ढूंढकर लाओगे, जो मिल रही हो उसी से कर लोग, वरना बाद में वह भी नसीब नहीं होगी।

यह भी हो सकता है कि लोगों को उसकी आजादी खटकती हो। क्योंकि न जाने ये कैसा जादू है कि शादी होते ही अधिकतर पुरुषों के दिव्य चक्षु खुल जाते हैं और उन्हें आत्मबोध हो जाता है। वे मन ही मन गाने लगते हैं, शादी करके फंस गया यार, अच्छा-खासा था कुंवारा। या फिर जब से हुई है शादी आंसू बहा रहा हूं, आफत गले पड़ी है, उसको निभा रहा हूं। यह भी हो सकता है कि उन्हें लगता हो कि अगर वे मुसीबत में हैं तो फिर कोई और अकेलेपन के साथ मौज कैसे कर सकता है। इसलिए सभी मिलकर उसकी घेराबंदी शुरू कर देते हैं।

अब राहुल गांधी को ही लीजिए, उनका कुंवारापन जैसे राष्ट्रीय समस्या बन गया है। लोग खोज-खोजकर खबर ला रहे हैं कि उनकी पता नहीं किस देश में कोई गर्ल फे्रंड है। हालांकि उसके बारे में वे खुद स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन इसके बाद भी हर थोड़े दिन फिर कोई नया शिगूफा छोड़ दिया जाता है। इस बार रायबरेली की विधायक अदिति सिंह को ले आए हैं। सोनिया के साथ उनका फोटो वायरल किया जा रहा है कि इनके साथ सब तय हो गया है। अब वे बेचारी स्पष्टीकरण दे रही हैं कि मैं राहुल गांधी को राखी बांधती हूं, लेकिन यह कौन सुनना चाहता है।

इन सबके बीच अफसोस है कि देश में लोकतंत्र किस मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है। जनता के मुद्दे हाशिए पर हैं। बहस इस बात पर हो रही है कि कौन अपनी स्त्री के साथ रहता हैै या उसे छोड़ रखा है। किसी की शादी हुई है या वह गर्ल फ्रेंड के साथ ही खुश है। कोई किसी शब्द को कितने अच्छे से उच्चारित करता है। अगर सियासी मापदंड इस हद तक गिर जाएंगे तो देश के लोकतंत्र को रसातल में जाने के लिए हम कोई वराह कहां से ढूंढ कर लाएंगे।
Courtesy अमितमंडलोई संपादक  पत्रिका इंदौर की फ़ेसबुक वाल से

ARE WE FREE?

15th of August 1947, a day that is considered to be written in golden words in the history of India. The day we had a shift in slavery laws, from the British to the hands of today’s constitution that is made and governed by the ‘elected ones.’

Let’s go deep into the history of India, and try and figure out what we have been made of, or how have we come up through the ages.  Right from the Indus valley civilization, we have been ruled by the kings, some good some bad. There were very small provinces, first united by the Maurya Dynasty (as per records), than fragmented. We have always been invaded, and have only tried to save our heads during all these times, rather than uniting together and fighting for a cause. Our culture had been hindered, modified and tempered by the invaders, resulting in the situation today where we are living in the East and copying the West.

The British came to India and started capturing small provinces and with their fantastic planning acumen, conquered the whole country, and the only good thing about it was that for the first time, the country, INDIA, was united, documented and ruled by a single ruler. It was for the first time we had a thing called ‘constitution’ in place, and we were thus introduced to a bureaucratic system.

 So, if I say that since the inception, from nearly 300BC, we have been taught to live as slaves, or we have been genetically modified to follow the laws/ leaders without any reasoning power and the deviation from which is termed as a crime, am I wrong? 

Never the less, the changes have come! Then, we had rulers, their courts and the appointed ones; now we appoint our own ‘rulers.’ Then, we had to run for our heads & lives, and it was the King’s liability to provide food & security; now we have to run for our own food and security needs, our ‘elected ones’ take away their ‘shares’ and are least bothered about what happens to the public. Then, the law & order was always in place; now it has become a pet puppy of some individuals, and the place called Parliament, the court of the elected ones can amend any law of justice for common man. Apparently, today we are in the same position or even worse.

If socio-economic freedom is the perception of some individuals, there are very few, who are actually free of Peer pressure, Family pressure, Government pressure etc… Primarily, every one of us is burdened with liabilities and indebted to each and every one around us in one way or other. And while coming up from those debts, we are either too old to think about ‘freedom’ or we have buried our instincts deep down under the worldly attractions that tempt us to enjoy what we have earned, and those temptations are unending….

Rajnish Osho gave a defining statement to his followers-

“Never obey anyone’s command unless it is coming from within you also.”

Do you hear a voice coming from within??

By Anurag Agrawal