ये रोशनी और ये पटाखों का शोर

1-2 अक्टूर 1998 की रात है। जोधपुर के पास कांकणी गांव के लोग शोर सुनकर अचानक जाग जाते हैं। दौडक़र घरों से बाहर आते हैं। एक जिप्सी जाती हुई नजर आती है। उसमें फिल्म स्टारों की टोली है। जमीन पर दो हिरण के शव पड़े दिखाई देते हैं। एक हिरण की रीढ़ की हड्डी में गोल निशान है। इसके बाद 20 साल लगते हैं, यह साबित करने में कि हिरण का शिकार किया गया है। बाकी लोग बरी हो जाते हैं, सिर्फ एक दोषी साबित होता है। वह भी दो रात और दिन के एक टुकड़े के लिए जेल जाता है, फिर जमानत पर बाहर आ जाता है। आप हिसाब लगाते रहिये कि सक्षम अदालत का फैसला कितने घंटों तक प्रभावी रहा।

क्योंकि यह हिसाब से सुलझने वाला मसला ही नहीं है। बस इस केस के 20 वर्षीय सफर पर गौर कीजिए। कैसी-कैसी दलीलें दी गई हैं। मामले में दोषी साबित अभिनेता सलमान खान ने तो एक टीवी इंटरव्यू में यह तक कहा कि मैंने तो हिरण की जान बचाई है। मैं वहां पहुंचा तो वह घायल था। मैंने उसे पानी पिलाया, बिस्किट खाने को दिए। उसने कुछ बिस्किट खाए और वह वहां से चला गया। गोया वह यह बताने की कोशिश कर रहा हो कि कैसे अहसानफरामोश लोग हैं, वे एक फरिश्ते को ही शिकारी समझकर कोर्ट-कचहरी में घसीट रहे हैं।

उनके वकील ने भी अदालत में कुछ ऐसा ही तर्क दिया कि हिरण की रीढ़ पर जो गोल निशान है, वह गोली का ही हो यह जरूरी नहीं है। ऐसा निशान जलते हुए कोयल से भी हो सकता है। यानी किसी ने सुलगता हुआ अंगारा हिरण की पीठ पर रखा होगा और तब तक दबाया होगा जब कि उसकी हड्डी में सुराख न बन गया हो। फिर बेहद आला दर्जे की यह दलील भी पेश की गई कि जांच एजेंसी ने हिरण की स्किन रिसर्च के लिए नहीं भेजी गई। सिर्फ रीढ़ की हड्डी भेजी गई, जबकि स्किन से अहम सुराग मिल सकता था। फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रीढ़ के उस छेद को गोली का घाव बताया गया है।

हद तब हुई जब वकील ने यह तक कह दिया कि हिरण तो ज्यादा खाने से मरे हैं। ये भी हो सकता है उन्हें क्षेत्र के कुत्तों ने ही मार दिया हो। जब इलाके में ही इतने खूंखार कुत्ते हैं तो फिर बाहर के किसी व्यक्ति के लिए इसकी क्या गुंजाइश निकल सकती है। वकील साहेबान ने यह तर्क भी दिया कि नई सोच के तहत बेल इज द रूल एंड जेल इज एक्सेप्शन यानी जेल तो सिर्फ दुर्लभ मामलों के लिए बचा के रखिये, बाकी के लिए तो जमानत ही नियम है। ये और बात है कि ज्यादातर मामलों में जमानत को जज का विवेकाधिकार माना गया है। अब विवेक और अधिकार दोनों किसी के खूंटे से बंधी भैंस तो नहीं है कि जब चाहे हकाला जाए और जब चाहे उसके दूध से भगोना भर लिया जाए।

आप तो तालियां बजाइये कि क्या गजब व्यवस्था है। हम ही तो कहते आ रहे हैं कि चाहे 10 गुनहगार बच जाएं, लेकिन एक भी बेकसूर को सजा नहीं होना चाहिए। हमने 10 गुनहगारों में से एक बेकसूर को बचाने में ही पूरी ताकत झोंक रखी है। और उसे बेकसूर बनाने के लिए कितनी जद्दोजहद की गई है, इस पर भी गौर कीजिएगा। वे मददगार हैं, सहृदय हैं, ये सारी कहानियां बाद ही में तो छनकर बाहर आई हैं। इसके पहले तो इसे धमकाया, उसे पीटा, उसके साथ गाली-गलौज की, टाइप के ही केसेस सामने आते थे। आप इसे कानून के डर से व्यक्तित्व निर्माण की अनूठी मिसाल भी कह सकते हैं।

इसलिए कभी-कभी समझना मुश्किल हो जाता है कि कानून हमें चला रहा है या हम कानून को चला रहे हैं। कभी-कभी कानून हार्ट पेशेंट के ईसीजी की तरह लगता है। कब-कितना ऊपर जाएगा और कब कितना नीचे जा सकता है, अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। सवाल पूछने की इजाजत नहीं है वरना पूछ सकते थे कि आखिर ऐसा कैसे हो जाता है कि जो केस 15 नंबर पर सूचीबद्ध हुआ था, वह अचानक 1 नंबर पर आ गया। जमानत बख्शने वाले जज को सजा देने वाले जज से मंत्रणा की आवश्यकता क्यों आन पड़ी।

इन सबके बाद भी ये रोशनी और ये पटाखों का शोर सुनकर दिल में हुक सी उठती है। मन करता है कि काश एक छोटा सा दीपक कोई उस विश्नोई समाज के लिए भी जलाए, जिसके अथक और अहर्निश संघर्ष की बदलौत ही इन्हें 20 दिन जेल में बिताने पड़े हैं। हम इसी से संतोष कर सकते हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि तमाम गवाहों के बयानात और सबूतों की चकाचौंध रोशनी के बावजूद देश में कानून सांस ले रहा है।

सवाल पूछने की आदत से बाज न आए तो आखिर में इतना जरूर पूछ लीजिएगा कि क्यों किसी अदालत का कोई फैसला दो रात और दिन के एक टुकड़े के बाद ही नए अर्थ ग्रहण कर लेता है।

 

Courtesy @ अमित मंडलोई