जात न पूछो उपद्रवी की

उसने कहा, मैं नाराज हूं। मैंने कहा, तुम्हे इस बात का हक है। उसने कहा, मेरे साथ पीढिय़ों से अन्याय हुआ है। मैंने माना, मैं इसके लिए शर्मिंदा हूं। उसने फिर कहा, अन्याय का प्रतिकार किया जाना चाहिए। मैंने स्वीकार किया। उसने दोहराया, उन्हें इसका मूल्य चुकाना ही होगा।

अब सवाल करने की बारी मेरी थी। मैंने पूछा, जिन लोगों ने यह सब किया वे कहां हैं। उसने मध्यम स्वर में जवाब दिया, वे तो अब नहीं हैं। मैंने पूछा, उनका साथ देने वाले लोग। वह बोला वे भी चले गए। मैंने कहा, कोई तो होगा ही उनमें। उसने धीमे से जवाब दिया.. नहीं अब कोई नहीं है। मैंने फिर पूछा तब फिर बदला किससे लोगे। वह बोला, लोग चले गए, लेकिन सोच नहीं बदली है। अब भी हमारे लिए चाय का कप अलग है। सामने जूते पहनने की इजाजत नहीं है। बरात नहीं निकाल सकते। मंदिर में नहीं जा सकते।

मैंने पूछा क्या सब ऐसा कर रहे हैं, उसने आंख नीचे कर कहा, नहीं कुछ लोग हैं। मैंने फिर सवाल किया तो क्या कुछ की सजा सबको दिया जाना लाजमी होगा। वह कुछ नहीं बोला। मैंने दोहराया, तुम्हारे किए की सजा क्या तुम्हारे बेटे को दी जा सकती है। तुम जिस क्लास में फेल हुए, क्या उसमें तुम्हारे बेटे को भी पास होने का हक नहीं होगा। वह कुछ नहीं बोल पाया। मैंने फिर पूछा, क्या मानसिकता सिर्फ उनकी ही नहीं बदली है या बाकी लोग भी इसमें शामिल है। वह कुछ नहीं बोल पाया।

फिर अचानक से उसे कुछ खयाल आया। झुंझलाते हुए बोला। इन बातों से काम नहीं चलेगा। हमारे साथ अन्याय हुआ है और अन्याय का बदला हम लेकर रहेंगे। यही कहा गया है, यही बताया जा रहा है और यही हो रहा है। अभी कुछ दिन पहले होटल में भी मार दिया था। क्या हम होटल में बराबर बैठकर खा नहीं सकते। हम भी इंसान हैं, इंसान का दर्जा नहीं देंगे तो कैसे चलेगा। मैंने पूछा, वह एक जघन्य अपराध था भाई। उसके लिए कानून सजा देगा। यहां भी तो 17 लोग मार दिए गए हैं। क्या इसकी सजा नहीं मिलना चाहिए।

वह बोला, आखिर कब तक अन्याय सहेंगे हम। मैंने कहा, तुम क्या चाहते हो। वह तपाक से बोला, हमें इंसाफ चाहिए। पूूछा, इंसाफ माने क्या। क्या किया जाए जिससे तुम्हे लगे कि पीढिय़ों के अत्याचार का बदला चुका दिया गया है। वह कुछ नहीं बोल पाया सोच में पड़ गया। मैंने कहा, यही चाहते हो ना कि बच्चों की पढ़ाई का अच्छा इंतजाम हो, उन्हें अपने आपको विकसित करने के पूरे मौके मिले। नौकरी में प्राथमिकता दी जाए। वे खुद को किसी तरह हीन न समझें। इसके लिए हर संभव प्रयास हो।

उसने कहा, हां यही, यही होना चाहिए। मैंने पूछा, पर यह सब तो हो ही रहा है। फिर आक्रोश किस बात का। ये नाराजगी क्यों। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, कहने लगा लेकिन जो अन्याय हुआ है, उसका क्या होगा। मैंने कहा अगर अन्याय का बदला अन्याय ही है तो फिर यह तो कभी खत्म ही नहीं होगा। एक अंतहीन सिलसिला चलता रहेगा। एक गोला घूमता रहेगा।

मेरी पीढ़ी ने तुम्हारी पीढ़ी के साथ। तुम्हारी पीढ़ी ने मेरी पीढ़ी के साथ। फिर यह उल्टे-सीधे, सीधे-उल्टे क्रम में चलता रहेगा। क्या चाहते हो, देश को तमाम मसले छोडक़र इन्हीं पर लड़ते देखना चाहते हो क्या। वह कुछ नहीं बोल पाया। फिर उसे कहीं से एक झंडा याद आया। कहने लगा, नहीं ये झंडा सबसे ऊपर होना चाहिए। तभी देश बदलेगा, जब ताकत हमारे हाथ होगी, तब ही तो निजाम बदलेगा। मैं समझ चुका था कि वह सब समझता है, लेकिन चंद लोगों की सियासी भूख ने जिन्हें मोहरा बना लिया है, उन्हें समझाना इतना आसान भी कहां हैं।

इतना जरूर है कि हर बात का फैसला अगर सडक़ पर होने लगा तो देश को जंग का मैदान बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। देश व्यवस्थाओं के अनुशासन से चलता है। कोई भीड़ या भेड़तंत्र कभी इसका सूत्रधार नहीं हो सकता। लाठियों से भैंस हांकी जा सकती है, तंत्र को हांकने की गलती मत कीजिए। यह लोकतंत्र है, अगर तर्क में दम है और विचारों में आग है तो आइये बहस कीजिए।

मुद्दे उठाइये, अदालतों के दरवाजे खुले हैं, वहां जाइये। न्याय की गुहार लगाइये। यदि फिर भी हल न मिले तो संसद की राह भी खुली है। निजाम बदलने की जुर्रत दिखाइये। सडक़ों पर बेगुनाह लोगों की जान लेकर कुछ हासिल नहीं होने वाला है। लाठियां बोएंगे तो लाठियां ही उगेंगी और आप के हिस्से में भी आज नहीं तो कल वे ही आएंगी।

 

Courtesy Amit ji (Editor of Patrika)