कुंवारों ने ऐसी क्या खता की

समझना मुश्किल है कि आखिर देश के कुंवारों से ऐसी क्या खता हुई है कि लोग उन्हें छोडऩे का नाम नहीं लेते। गली-मोहल्लों से लेकर ग्लैमर और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की उम्र जरा बढ़ी नहीं कि लोग बातें बनाने लगते हैं। नाक में खुजली होने लगती है कि कहीं चक्कर तो नहीं चल रहा। गोया लोग ये हजम ही नहीं कर पाते कि कोई सामान्य पुरुष स्त्री के प्रति आकर्षित हुए या उसके चक्कर में पड़े बगैर जीवित रह सकता है। जिस देश में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक कुंवारे रह चुके, वहां किसी का कुंवारापन न जाने क्यों सभी की आंख में खटक रहा है।

एमए अंग्रेजी की पढ़ाई के दौरान चाल्र्स का बेचलर्स कम्प्लेंट पर एक निबंध पढ़ा था, जिसमें वे एक कुंवारे व्यक्ति की व्यथा बयां करते हैं। बताते हैं कि शादीशुदा लोग कुंवारों का जरा ध्यान नहीं रखते हैं। सार्वजनिक स्थलों पर भी प्रेम प्रकट करने लगते हैं। उन्हें जरा खयाल नहीं आता कि आसपास कोई कुंवारा व्यक्ति भी हो सकता है, उसके दिल पर ये सब देखकर क्या गुजरती होगी, लेकिन अपने यहां तो किस्सा ही उलटा है।

जब वी मेट में ट्रेन छूट जाने पर हीरोइन स्टेशन मास्टर के कैबिन में पहुंचती है तो बूढ़ा रेल अधिकारी उसे मुफ्त की सलाह देता है। कहता है, अकेली लडक़ी खुली तिजोरी की तरह होती है। लडक़ी के प्रति इस सोच के पारंपरिक कारण तो फिर भी समझ आते हैं। सदियों से कुंठित पुरुष मानसिकता इससे अधिक आम बात क्या सोच सकती है, लेकिन वैसे ही बेसब्री किसी पुरुष के प्रति थोड़ा असहज करती है। हो सकता है, जैसे उन लोगों को अकेली लडक़ी खुली तिजारी लगती है, वैसे ही अकेला लडक़ा छुट्टा सांड नजर आता हो।

ये भी संभव है कि उन्हें डर हो कि कहीं इसके कारण उनके घर की कोई स्त्री खतरे में न पड़ जाए। इसलिए बेहतर है कि कहीं से भी कोई खूंटा ढूंढ कर गाड़ा जाए और उससे इस अकेले पुरुष को भी बांध दिया जाए। इसलिए जरा उम्र बढ़ी नहीं कि साथ के लोग ही ताने मारने लगते हैं। उलाहने देते हैं, अड़ोसी-पड़ोसी से लेकर नाते-रिश्तेदार भी खिंचाई पर उतर आते हैं। भई अब तो बाल भी सफेद होने लगे हैं, किस का इंतजार कर रहे हो। ऐसी कौन सी परी ढूंढकर लाओगे, जो मिल रही हो उसी से कर लोग, वरना बाद में वह भी नसीब नहीं होगी।

यह भी हो सकता है कि लोगों को उसकी आजादी खटकती हो। क्योंकि न जाने ये कैसा जादू है कि शादी होते ही अधिकतर पुरुषों के दिव्य चक्षु खुल जाते हैं और उन्हें आत्मबोध हो जाता है। वे मन ही मन गाने लगते हैं, शादी करके फंस गया यार, अच्छा-खासा था कुंवारा। या फिर जब से हुई है शादी आंसू बहा रहा हूं, आफत गले पड़ी है, उसको निभा रहा हूं। यह भी हो सकता है कि उन्हें लगता हो कि अगर वे मुसीबत में हैं तो फिर कोई और अकेलेपन के साथ मौज कैसे कर सकता है। इसलिए सभी मिलकर उसकी घेराबंदी शुरू कर देते हैं।

अब राहुल गांधी को ही लीजिए, उनका कुंवारापन जैसे राष्ट्रीय समस्या बन गया है। लोग खोज-खोजकर खबर ला रहे हैं कि उनकी पता नहीं किस देश में कोई गर्ल फे्रंड है। हालांकि उसके बारे में वे खुद स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन इसके बाद भी हर थोड़े दिन फिर कोई नया शिगूफा छोड़ दिया जाता है। इस बार रायबरेली की विधायक अदिति सिंह को ले आए हैं। सोनिया के साथ उनका फोटो वायरल किया जा रहा है कि इनके साथ सब तय हो गया है। अब वे बेचारी स्पष्टीकरण दे रही हैं कि मैं राहुल गांधी को राखी बांधती हूं, लेकिन यह कौन सुनना चाहता है।

इन सबके बीच अफसोस है कि देश में लोकतंत्र किस मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है। जनता के मुद्दे हाशिए पर हैं। बहस इस बात पर हो रही है कि कौन अपनी स्त्री के साथ रहता हैै या उसे छोड़ रखा है। किसी की शादी हुई है या वह गर्ल फ्रेंड के साथ ही खुश है। कोई किसी शब्द को कितने अच्छे से उच्चारित करता है। अगर सियासी मापदंड इस हद तक गिर जाएंगे तो देश के लोकतंत्र को रसातल में जाने के लिए हम कोई वराह कहां से ढूंढ कर लाएंगे।
Courtesy अमितमंडलोई संपादक  पत्रिका इंदौर की फ़ेसबुक वाल से