ईश्वर से प्रेम का मतलब पुजारी से प्रेम नहीं है

उन्होंने कहा स्त्री को छोड़ दो, मैंने पूछा क्यों, जवाब मिला मोह है। सद्मार्ग की राह का रोड़ा है। फिर कहा, धन-संपत्ति का त्याग कर दो, पूछा तो जवाब मिला माया है, मोहिनी है। पथभ्रष्ट कर देती है। मैंने कहा, ठीक है, मैं सब छोड़ दूंगा, बदले में क्या मिलेगा। जवाब आया, स्वर्ग मिलेगा। वहां क्या होगा तो सुनने को मिला, वहां सोने के पहाड़ हैं, पेड़ों पर हीरे-पन्ने लगते हैं। अपूर्व सुंदरी रंभा, उवर्शी और मेनका है। मैं समझ नहीं पाया कि अपनी स्त्री और पसीने की कमाई को छोडक़र स्वर्ग की मरीचिका में क्यों कूद पडूं। जवाब, उन्होंने ही दिया, जब मैंने पूछा कि अच्छा ये सब छोडक़र सौंपूं किसे तो कहने लगे, मुझे और किसे।

यह कहानी, थोड़े-बहुत बदलावों के साथ लगभग हम सभी ने सुनी है और कई ने इसे करीब से महसूस भी किया होगा। यही हो रहा है ना लंबे समय से हमारे साथ। कभी ईश्वर के प्रति प्रेम और आस्था जताकर तो कभी अनिष्ट का भय दिखाकर। हमें मोह और माया में डालने वाली चीजें छोडऩे को प्रेरित किया जा रहा है। हमारे उसी त्याग से बड़े-बड़े आश्रम बनाए जा रहे हैं। महंगी विदेशी गाडिय़ां खरीदी जा रही हैं। कीमती गहने और पोषाक तैयार की जा रही हैं। दुनिया को वैराग्य की राह दिखाने वालों में से अधिकतर खुद स्वर्गिक ऐशो-आराम में डूबे हैं। उन्हें न मोह सताता है और न ही माया से परहेज है। जिसे हमारे पैरों की बेड़ी कहते हैं, उसे ही उन्होंने कंठाहार बना रखा है।

तौर-तरीके देखे हैं ना। कितना बड़ा पंडाल लगेगा, उसमें कितने लोग कम से कम होंगे। भजन पार्टी कहां से आएगी। कितने लोगों का और कैसा भोजन बनेगा, ये सब बाबाजी तय करेंगे। टेंट हाउस तो खुद बाबाजी का है ही, चढ़ावे में भी उनका हिस्सा होगा। उसका प्रसारण किस चैनल पर होगा, इसका इंतजाम भी करना होगा। बाबाजी की दक्षिणा तय है, मंडली का इंतजाम भी पूर्व निर्धारित है। बाहर की दुकानों में बाबाजी की पुस्तकें बिकेंगी, पूजा सामग्री, फोटो, सिंदूर, मालाओं के साथ आयुर्वेदिक चूर्ण भी चटाए जाएंगे। आखिर में लोगों से गोदान कराई जाएगी, गुरुकुल में बटुकों के अध्ययन के लिए सहयोग मांगा जाएगा, तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशाला में सुविधाओं के लिए कमरे बनवाए जाएंगे, उनमें आपके नामकी पट्टिकाएं लगाई जाएंगी। इस दावे के साथ कि ये सारी पट्टिकाएं स्वर्ग में आपके महल की एक-एक ईंट बनेगी और वह भी खालिस सोने की।

हंसी आती है, लेकिन यह सब सच है। और इसकी वजह एक ही है हमने ईश्वर से प्रेम का मतलब पुजारी का प्रेम समझ लिया है। हम ईश्वर को प्रसन्न करने के बजाय पंडे-पुजारियों को प्रसन्न करने में लगे हुए हैं। न जाने कैसे ये धारणा हमारे भीतर गहरे तक पैठ गई है कि ये पंडे-पुजारी और कथा वाचक ईश्वर के करीब हैं और ये ही हमें उन तक पहुंचा सकते हैं। न भी पहुंचाएं तो कम से कम हमारे अच्छे-बुरे का हिसाब सुलझाने-सलटाने में मदद तो कर ही सकते हैं। हम भूल गए कि ईश्वर का दूत कभी भी प्राफिट एंड लॉस अकाउंट हाथ में लेकर नहीं आएगा। नफे-नुकसान की भाषा उसकी भाषा हो ही नहीं सकती।

वह आएगा भी तो शरीर पर भस्म रमाए, लंगोट पहने, मलंगों के वेश में निकलेगा। हाथ में कमंडल होगा तो ठीक वरना अपने हाथ को ही पात्र बना लेगा। न छत की परवाह करेगा और न फर्श की चिंता में डूबा होगा। गृहस्थ भी होगा तो विरक्त होगा। जो किचिंत भी मठ-मंदिर-मस्जिद और आश्रम में उलझा है वह खुद क्या ईश्वर के करीब होगा और क्या हमें उस तक पहुंचाएगा। क्यों विवेकानंद भटकते थे एक ही सवाल लेकर, क्या आपने ईश्वर को देखा है। क्यों तमाम ज्ञानी-ध्यानी और प्रकांड विद्वान सकपका जाते थे यह सवाल सुनते ही। और आखिर में जिसने जवाब दिया नरेंद्र फिर कुछ और पूछ ही नहीं पाए, आखिरी सांस तक उसी के होकर रह गए।

दरअसल समस्या की जड़ यही है कि न जाने क्यों हम सब सामना करने के बजाय हमेशा माध्यम की तलाश में रहते हैं। चाहे फिर वह चुनौती हो या अवसर। हम चाहते हैं कि सीधे रास्ते के बजाय सबकुछ शॉर्टकट से मिल जाए। हमें मालूम है ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता क्या है, लेकिन हम उस पर चलने के बजाय चरणामृत पीकर, प्रसाद का पेड़ा खाकर ही उसे हासिल करने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। कहीं सवा रुपया चढ़ाकर स्वर्ग की सीढ़ी चढऩे का ख्वाब पाल लेते हैं, कहीं गाय को कुछ खिलाकर तसल्ली कर लेते हैं।

क्योंकि हौसला नहीं है, आत्मविश्वास नहीं है। इसलिए पंडित, पुजारी और मौलवियों के चक्कर काटते हैं। गाड़ी के बे्रक भले फेल हों, लेकिन उस पर नीबू-मिर्च टांगना नहीं भूलते। हमने अपनी जिंदगियां भी ऐसे ही नीबूू-मिर्च के हवाले कर रखी है, जानते हैं फिर भी समझना नहीं चाहते।

 

याद है ना वह जुमला जो हर प्रवचन के बीच-बीच में दोहराया जाता था। जय राम जी की बोलना पड़ेगा। लोग जोश में भरकर तुरंत जय राम जी की बोल देते थे। हम भी सोचते थे कि चलो किसी बहाने ही सही अगर लोग राम का नाम ले रहे हैं तो क्या बुरा है। किसे पता था कि लोगों से अलग-अलग अंदाज में राम का नाम लेने के लिए प्रेरित करने वाला खुद राम के सवर्था विपरीत आचरण को जी रहा है। आज अंजाम तक पहुंचे हैं, शायद इसके बाद ही सही लोगों को समझ आए कि हमारा ईश्वर और धर्म किसी आसाराम का मोहताज नहीं है। अगर है तो हमें उसके बारे में फिर से सोचना होगा।
Courtesy #अमितमण्डलोई